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Saturday, 2 July 2011

लो भाई ओ हरियाणवी आदमी का वो अंदाज़ देखो जो उसकी पहचान स,,, हम तो काच्चे कट रे सां

जिंदगी की रेल न चैन खीच के डाट रे सां
बेशक लोग किम्मे कहो, हम तो काच्चे कट रे सां
किसने बुरा मान्य स घरवाली की डाट का
वा बेशक शेरू मार देवे काढ के न खाट का
कालम वफादारी के सारे के सारे भर दयां सां
महीने आल्ले दिन तनखा हाथ पे ल्याके धर दयां सां
देर सेवर सूट उसके प्रेस भी हम कर दयां सां
हाँ ,हम सब्जी भी खरीद के ल्यावा सां
बालका न भी खिलावां सां, झूठी हाँ म हाँ मिलावा सां
छुट्टी आल्ले दिन उसका रसोई म हाथ बटावा सां
क्योकि भाई ओ हम तो जीना चाहवां सां
पर, रोटी पोवण त हम कद नाट रे सां .........लोग किम्मे कहो...............
फोर्थ क्लास डिपार्टमेंट न सेवा खातर बनाई स
पर चपड़ासी के दर्द त, किसने आँख मिलाई स
फेर भी अपने साहब का पूरा हुक्म बजावा सां
रोज़ क्लरका न अपनी जेब त बीडी प्यावा सां
बालका न स्कुल में भी छोड़न जावा सां
रोज़ सिलेंडर भी भरवा के ल्यावा सां
इतनी सेवा करके भी फेर भी हम बदनाम सां
लोग कहवे स रिस्पत का, हम पहला मुकाम सां
रोज़ सवेरे ऑफिस में हम ए झाड़ू मारां सां
फाइल गेल्या फाइल आल्ले न, हम ए पार उतारा सां
पर, फिलहाल तो हम दफ्तर में ताश बाँट रे सां .........लोग किम्मे कहो................
हम प्रधानी करनिये तूफ़ान उठा देवां
एंडी त एंडी आदमी न एक बी धमका देवां
आच्छी दाऊ ना जाने, गाम राम माहरे टोरे न
बेशक हो झूटमूठ का, लगवा दयां हम छोरे न
सारे डिपार्टमेंट का रवेया हमने चाख्या स
हाँ, समाजसेवा करण का ठेका ले राख्या स
फेर भी , लोग हमने खाऊ पीर कहवे स
मुह प कोन्या, पीठ पीछे फकीर कहवे स
पर, लोगा की बात का के बुरा माना
हम पंजी ना राखा, अर जाने सारा पाना
बस राजनीती में थोडा सा उपर जाना चाहवां सां
योहे कारण स, कुरते में डेली नील प्यावां सां
बिना नौकरी के भी देखो हम रंग छांट रे सां ...........लोग किम्मे कहो.................

लो जी शनिवार के नाम मेरी दारुशाला के ये दो जाम



बड़े-बड़े खानदान डुबो दे बेशक ठेके की गंगा
बिन पानी इज्जत धो दे बेशक ठेके की गंगा
धन दौलत राजपाट का बेशक मलियामेट हो जावे
पर पीवनिया अपना नियम जीते जी रोज़ निभावे

कदे त बुरा कहलाता आया, यो ज़ालिम प्याला दारू का
पर दारू पीवण त ए मिटेगा,एक दिन छाला दारू का
ख़ुशी में भी जाम छलके और  गमी में भी देवे साथ
बोतल जिसकी हमसफर स मस्ती उसकी भर ले बांथ