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Friday, 4 November 2011

दबंगा की दमबाजी नै पपोल के जाऊंगा



पहली बार आया सूं कुछ बोल के जाऊंगा
कालजा चार भाईया का छोल के जाऊंगा

सीधी चोट मारूंगा सबते निचले घड़े कै
दबंगा की दमबाजी नै पपोल के जाऊंगा

शक्ल तै बावलीबूच दिखू सूं तो के होया
स्याणे लोगा की नब्ज़ टटोल के जाऊंगा

उम्र भर मात्राओ के बोझ तले दबे सै जो
मैं वजन उन शायरों का तोल के जाऊंगा

कदे सौ ग्राम भी दूध ना देते पड़ोसिया नै
झोटी उन ज़मींदारा की खोल के जाऊंगा

मीठे के बाद नमकीन खावनिया खातिर
मैं चासनी में लाल मिर्च घोल के जाऊंगा

वो मुद्दत कै बाद मिल्या सै अकेला बेचैन
आंसूआ तै मैल मन का खंगोल के जाऊंगा

चुप थोड़े रहूँगा

मौका लाग्या सै आज चुप थोड़े रहूँगा
चाहे हो किसे कै खाज चुप थोड़े रहूँगा

मन की भडास सारी ए लिकाड़ दयूंगा
चाहे बुरा मानो समाज चुप थोड़े रहूँगा

अच्छे और बुरे की सब समझ आवे स
मैं भी खाऊं सूं अनाज चुप थोड़े रहूँगा

पैरां त पैदल सूं मगर दिमाग त नही
जब खुलग्या सै राज़ चुप थोड़े रहूँगा

मेरी शराफत उननै कमजोरी लागे सै
बणना पड़ेगा बेल्याज़ चुप थोड़े रहूँगा
क्यूकर जतावेगा वो अहसान मदद का
मैंने दे राख्या सै ब्याज चुप थोड़े रहूँगा

बेशक देर सवेर करूं दुश्मना का बेचैन
करके छोड़ना सै इलाज़ चुप थोड़े रहूँगा