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Friday, 4 November 2011

दबंगा की दमबाजी नै पपोल के जाऊंगा



पहली बार आया सूं कुछ बोल के जाऊंगा
कालजा चार भाईया का छोल के जाऊंगा

सीधी चोट मारूंगा सबते निचले घड़े कै
दबंगा की दमबाजी नै पपोल के जाऊंगा

शक्ल तै बावलीबूच दिखू सूं तो के होया
स्याणे लोगा की नब्ज़ टटोल के जाऊंगा

उम्र भर मात्राओ के बोझ तले दबे सै जो
मैं वजन उन शायरों का तोल के जाऊंगा

कदे सौ ग्राम भी दूध ना देते पड़ोसिया नै
झोटी उन ज़मींदारा की खोल के जाऊंगा

मीठे के बाद नमकीन खावनिया खातिर
मैं चासनी में लाल मिर्च घोल के जाऊंगा

वो मुद्दत कै बाद मिल्या सै अकेला बेचैन
आंसूआ तै मैल मन का खंगोल के जाऊंगा

2 comments:

Rajput said...

बैचेन जी , बहुत मजा आया आज आपके ब्लॉग को पढकर, सच कहता हूँ
आपके जैसा लिखने का अंदाज बहुत कम देखने को मिलता है | एक से एक
उम्दा शेर और वो भी इतनी सरल भाषा में की हर कोई समझ जाये .
बहुत खूब

V M BECHAIN said...

shukriya bhai