khas log

Sunday, 18 September 2011

दोस्तों या वा कविता स जो कोलेज के दिना में लिखी थी अर आज भी जद देखू सू तो मैंने आशिक की दिलेरी पै हैरानी होवे स अक महबूब त तारे तोडके ल्यावन की बात कहन त आछ्या स या कविता सुना दो | एकदम जमीनी बात - आप सब के लिए




तेरे प्यार में खागड गैल टकराके दिखा दयूं मैं
जिस गली में ज्यादा कुते हो जाके दिखा दयूं मैं

जो भी कीमत मांगेगी. एक मिनट में दे दयूंगा
नही किसे न कहवे तो गोबर खाके दिखा दयूं मैं
थोडा बहुत मैं जैंटलमैन सूँ, निरा मोलड कोन्या
कहवे तो घर त कोट पैंट नया ल्याके दिखा दयूं मैं

झूठमूठ का कोन्या थारा, असली रिश्तेदार सूँ
कर ब्याह तेरे भाई प जीजा कुहाके दिखा दयूं मैं
खाण-पीण की शर्त इश्क में ना लावे तू श्याणी
आधा किलो हरी मिर्च भी खाके दिखा दयूं मैं

सिवा रागनी के यारां न नही आवे स कुछ भी
पर तेरे खातर तुना तुना गाके दिखा दयूं मैं
कर बेचैन महोब्बत में विश्वास मेरी बातां का
भुन्ड़े त भुन्ड़े जोहड़ में नहाके दिखा दयूं मैं









Tuesday, 13 September 2011

जुदाई के बाद तडफावेंगे,मुलाकात के ये दिन




बहुत घणे याद आवेंगे मुलाकात के ये दिन
दिल में घा कर जावेंगे मुलाकात के ये दिन

यार प्यार महबूब, सारे ए तो कट्ठे होरे स
किसने नही सुहावेंगे,मुलाकात के ये दिन
गाम राम का बेरा नही, प्यार करणिया न
जुदाई के बाद तडफावेंगे,मुलाकात के ये दिन
आज सबके मन में योहे डर बैठ रह्या स
फेर कद दर्श दिखावेंगे मुलाकात के ये दिन
इतनी गहराई त महबूब न महसूस ना कर
धडकना में समा जावेंगे मुलाकात के ये दिन
मेरे पहल्यां ए जंचे थी बेचैन हो जावांगे
मन का चैन उड़ावेंगे मुलाकात के ये दिन