khas log

Saturday, 3 September 2011

घोड़ी चढ़ रहा था तो उस वक्त क्या तेरा गला बैठ गया गया था,,,,,,,,,,

एक भाई दूसर शहर में जाने के लिए रेलवे स्टेशन गया वो जैसे ही रेल में बैठने लगा एक आवाज़ आई इसमें मत बैठो इसके साथ आगे चलकर हादसा होगा,,वो बेचारा उतर कर वापिस घर आ गया, दुसरे दिन बस स्टैंड पर गया और वहां भी जब बैठने लगा तो आवाज आई यहाँ बी मत बैठो हादसा होगा,, वो फिर वापिस आ गया, तीसरे दिन जब वो हवाई जहाज़ पर बैठने लगा तो फिर आवाज़ आई,, उसने झूँझलाकर पूछा आप कौन हो जो बार बार टोकते हो,, तो आवाज़ आई मैं भगवान हूँ,, इस पर उस आदमी ने कहा ऐसा ही भगवान है तो जब मैं शादी के लिए घोड़ी चढ़ रहा था तो उस वक्त क्या तेरा गला बैठ गया गया था,,,,,,,,,,तू क्यों नही चिल्लाया ,,,,,,,

Thursday, 1 September 2011

घर बसाणा स तो काम करया कर



ख्याली पुलाव त कुछ कोन्य होवे
बेकार तनाव त कुछ कोन्य होवे
दरिया पार जाना स तो तैरके जा
कागज़ की नाव त कुछ कोन्य होवे
घर बसाणा स तो काम करया कर
जुल्फां की छाव त कुछ कोन्या होवे
कल्याण तो देश का हिंदी ए करेगी
अंग्रेजी कांव-कांव त कुछ कोन्या होवे
हर जगह छारे स माहरे गाबरू बेचैन
कौन कहवे स गांव त कुछ कोन्या होवे 

Wednesday, 31 August 2011

काहे की सीता राम की जोड़ी

मैंने दोस्त से कहा यार आपकी और भाभी जी की तो सीता राम की जोड़ी है, तो दोस्त ने चिढ कर कहा काहे की सीता राम की जोड़ी बेचैन जी,,, ना तो आपकी भाभी को कोई रावण उठाता और ना कही धरती फटती,,,,,,,,,,???

इससे अच्छा है मैं ही रांड हो जाऊ,,,,

सुबह उठते ही मैंने पत्नी से कहा रात मैंने एक सपना देखा,, जिसमे तुम्हारी बीमारी के कारण मौत हो गई और मैं रंडवा हो गया,, सुनकर पत्नी ने कहा कम से कम आज ईद का दिन है,, आज तो शुभ शुभ बोलो.. भगवान तुझे रंडवा क्यों करे,,, इससे अच्छा है मैं ही रांड हो जाऊ,,,,

Sunday, 28 August 2011

मेरा वो गीत अनजानेपनं में लिखा गया मगर आत्मा के पास आकर बैठ गया हाय रोज़ याद आवे स


हाय रोज़ याद आवे स बचपन के दिन 
रह-रह के मुहं चिढावे स बचपन के दिन

मेरी एक किलकी  त, घर सिर प उठ ज्यां था
मैं खानी पीणी चीज़ां प, जद ए रूठ ज्यां था
स याद मैन्ने, मेरी थी तोतली जुबान
सुण ले था एक ब जो भी, होवे था हैरान
नाच्या करूं था पैरां में, घुंघरू बांध के
हो कितनी ऊँची चाहे चद ज्यूँ था कांध प
किसने फेर थ्यावे स, बचपन के दिन
हाय रोज़ याद आवे स ..........................

जाते स्कूल में हम, लेके पंजी दस्सी
ठंडा का फंड ना था, पिवा थे रोज़ लस्सी
वो सुलिया डंका और वो छुपम-छुपाई खेलना
माटी का घर बणाके माटी की रोटी बेलना
वो काटके न चप्पल, फेर पहिये बणाने
डंडी के साथ रेहडू, अर टायर चलाणे
आंख्या में आंसू ल्यावे स, बचपन के दिन
हाय रोज़ याद आवे स .......................

वा हरा समन्दर गोपीचन्द्र आळी कविता गाणी
फेर मछली त ए पुछना, बता दे कितना पाणी
वो गुल्ली डंडा अर वो कंच्या आल्ला खेल
वो चोर सिपाई अर वो नकली थाना जेल
वो लूटना पतंग का, अर गाम के उल्हाने
वो शर्त लाके नहरा पे, दिन में कई ब नहाने
उम्र भर रुलावे स बचपन के दिन
हाय रोज़ याद आवे स,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ना दुःख कोए ना चिंता, ना फ़िक्र कोए गम
बालकपणे में सचमुच, बादशाह थे हम
इब चुन तेल लकड़ी और फंस रे सां भंवर में
चाल्ला सां रोज़ लेकिन रह रे सां घर की घर में
जीते जी मन की इब,  आरज़ू स याहे
बचपन सी वाहे मस्ती ,जीवन में फेर आये
बेचैन बणा जावे स , बचपन के दिन
हाय रोज़ याद आवे स ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
रह रह के मुहं चिढावे स ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

  





Friday, 26 August 2011

झाड़ फूंक के जादूगरों मन्त्र गुनगुनाओ



हरियाणे के नौजवानों मैंदान में आओ
अन्ना जी की क्रांति न और ऊँचा ठाओ
ना तो खड़ा नाश होवेगा थारे भविष्ये का
थम वर्तमान अपणा संघर्ष में बिताओ
भाई मनजीत न माहरा सर ऊँचा कर दिया
 संसद में ना तो डीसी ऑफिस में चिल्लाओ
नेताओ के मन का भुत काढ दो मिलके
झाड़ फूंक के जादूगरों मन्त्र गुनगुनाओ
खाली जीवण खातर खाणा छोड़ दो छोरयो
देश खातिर बाज़ुओ की ताकत आजमाओ
सब क्याये न खागे स लूट लूट के लीडर
बेचैन हो सके तो बचा खुचा माल बचाओ

Monday, 8 August 2011

दर्द दुनिया भर का लेके मर जाऊ


सबके नाम का मैं ए दुखी पा ल्यू
सोचू सूं गम त ब्याह रचा ल्यू
भूल त भी किसे क, ना आवे आंसू
समन्दर न अपनी पलका प बिठा ल्यू
दर्द दुनिया भर का लेके मर जाऊ
बाकिया न तंग पावण त बचा ल्यू
शोहरत तो शायद ना लेण देवेंगे लोग
बदनामी का ए इलज़ाम उठा ल्यू
बोलके बेचैन हाल पूछे स दोस्त
इस जुमले प जी भर के मुस्कुरा ल्यू

Wednesday, 3 August 2011

,अस्सी कोन काडे जा

एक बार एक सरदार कुंए म् पड़ग्या,अर किल्की मारण लाग्या ,धोर इ एक जाट किल्की सुण क भाज्या आया अर रुका मार क बोल्या' कोण स् भाई' ,सरदार न जवाब दिया 'अस्सी हां', जाट न जवाब दिया माफ़ करियो भाईसाबो,एक-दो होवा आर तो काड दु आर ,अस्सी कोन काडे जा

Monday, 1 August 2011

सुख अर वैभव का सबने मिले प्रसाद

दुनिया भर में बैठे हरियाणवी दोस्तां न
तीज के त्यौहार की दयु सूं मुबारकबाद
राम करे खुशियों की कोथली खुले सबके
सुख अर वैभव का सबने मिले प्रसाद

सदबुधी दे उननै जिनके, ओछे रिश्तेदार होवे


जल्दी त कोथली पहुंचा दे भाई, तीज आगी स
दे-देके ताने नणद अर सास्सू जी न खागी स

जब त लाग्या सामण तब त, योए दुखड़ा सह री सूं
के आवेगा,, के कुछ होगा, अपने आप त कह री सूं
ब्योंत स माडा पीहर का मैं इस रास्से में बह री सूं
फेर त्यौहार के नाम पे मेरी शामत लागी स.......दे-देके ताने नणद अर सास्सू.............

माँ और बाप रहे कोन्या मेरे  दो भाई स वे कमज़ोर
बड़ी मुश्किल त पाल रे टाबर बिना नौकरी डांगर ढौर
देवेंगे वो बेबे न कुछ बता क्यूकर मार देवू मैं बोर
मेरे भाईया खातर हाय गरीबी जाल बिछागी स ....दे-देके ताने नणद अर सास्सू.............

मेरी देवरानी और जिठानी ज्यादा मुह इतरावे स
जिस  कारण उनके घर त भर-भर झोले आवे स
मेरी हालत पे कोए ना हाय र तरस खावे स
या किस्मत की काली परछाई मेरे उप्पर छागी स ....दे-देके ताने नणद अर सास्सू.............

तीज मुबारक हो सारया न, सबका बेडा पार होवे
याहे दुआ देवे गरीबनी ना किसे की भी हार होवे
सदबुधी दे उननै जिनके, ओछे रिश्तेदार होवे
बात पते सबने बेचैन गरीबी बतागी स ....दे-देके ताने नणद अर सास्सू.............