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Monday, 25 July 2011

मरके विरासत में के देके जाओगे

नौजवानों सोच लो थम अपने टाबरा न
मरके विरासत में के देके जाओगे
झूठ चोरी जारी और फरेब की चासनी में
कौन से संस्कार भे के जाओगे
दे रहे हो जिस तरह  धोखा माँ बाप को
खुद संग यही क्या इतिहास दोहराओगे
वक्त है अभी भी सम्भल जाओ दोस्तों
वरना पीढियों का जुगाड़ क्र जाओगे

साँझ ढलते ही ख्वाब आने नहीं

अंगूर की बेटी के जो दीवाने नहीं
वो लोग महफ़िल में बुलाने नहीं
कल टूटते है तो आज ही टूट जाएँ
दोस्तों हमें झूठे रिश्ते निभाने नहीं
बिना पानी के जाम पीना पड़ेगा
यहाँ पर चलेंगे कोई बहाने नहीं
आने है जिसके आधी रात आयेगे
साँझ ढलते ही ख्वाब आने नहीं
अभी कल की ही तो बात है दोस्त
जख्म महोब्बत के पुराने नहीं
कोई तो बताये बेचैन जिसके
नसीब में इश्क के फसाने नहीं

Sunday, 24 July 2011

सोच रह्य सूं भगवान् सोवे स अक जागे स

भाईचारा दोस्तों, ना बेरा कित खुग्या,
तीज अर त्यौहार इब कती फीके लागे स
रिश्तया की शुद्धता इसी होरी स जणु,
दूध खातर भैंस क रोज़ टिके लागे स
हाय तौबा माचगी अर बढ्गी स तेरा मेरी
सोच रह्य सूं भगवान् सोवे स अक जागे स
धन धान्ये नौकरी अर सारा स जुगाड़ जिनके
वो भी आज बीपीएल बणन न भागे स

Saturday, 23 July 2011

सच्ची बात कहू तो मेरे दोस्तों

दोस्तों मुझे होश नहीं अब क्या सुनाऊ
कोई अफ़सोस नहीं अब क्या सुनाऊ
वो मेरा आदेश भला क्यों मानेगी
मैं उसका बॉस नही अब क्या सुनाऊ
सच्ची बात कहू तो मेरे दोस्तों
मन में जोश नहीं अब क्या सुनाऊ
ताकत की मुझसे उम्मीद रखने वालो
रिश्ते में सफेदपोश नहीं अब क्या सुनाऊ
मैं तो बेचैन हूँ सदा चैन को तरसता हूँ
इसमें मेरा दोष नही अब क्या सुनाऊ

मैं उसका बॉस नही अब क्या सुनाऊ

दोस्तों मुझे होश नहीं अब क्या सुनाऊ
कोई अफ़सोस नहीं अब क्या सुनाऊ
वो मेरा आदेश भला क्यों मानेगी
मैं उसका बॉस नही अब क्या सुनाऊ
सच्ची बात कहू तो मेरे दोस्तों
मन में जोश नहीं अब क्या सुनाऊ
ताकत की मुझसे उम्मीद रखने वालो
रिश्ते में सफेदपोश नहीं अब क्या सुनाऊ
मैं तो बेचैन हूँ सदा चैन को तरसता हूँ
इसमें मेरा दोष नही अब क्या सुनाऊ

पीकर शराब आज एक गजल लिखी है

पीकर शराब आज एक गजल लिखी है
मैंने खराब आज एक गजल लिखी है
जाने क्या गुजरेगी बागवां पर यारो
तोड़, गुलाब आज एक गजल लिखी है
आसमा के चाँद को रखकर के आँखों में
जमी के, महताब आज एक गजल लिखी है
गर बुरा न मानो तो तुमको लेकर मैंने
मेरे जनाब आज एक गजल लिखी है
वो बेचैन को कभी तो चैन देगी ही
लेकर ख्वाब आज एक गजल लिखी है

Friday, 22 July 2011

डॉक्टर कुमार विश्वास की ,,,,,,कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है,,,,रचना का हास्य कवि वी एम बेचैन की और से हरियाणवी जवाब -----------

तू कोए काम धंधा कर आशिकी छोड़ दे प्यारे
याए कहरे धरती अम्बर आशिकी छोड़ दे प्यारे
जो तेरे त दूर रहवे स वा सिर प आके बैठ ज्यागी
फेर रोवेगा जीवन भर आशिकी छोड़ दे प्यारे
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महोब्बत जिसने कह रह्य स, उसका नाम स खर्चा
आज की हीर और मीरा का कराना काम स खर्चा
रोवेगा छोरिया खातर तो एक दिन आंधा होज्यागा
नहीं मेरी तेरे जंचती, तो करवा इश्क प चर्चा
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हाथ न माथे प धरके, तू एक दिन रोवेगा बेटा
गये दिन याद कर करके, तू एक दिन रोवेगा बेटा
उसने हर बार हज़ारां का, गिफ्ट देवन त पहल्या सुन
कर्ज़ में डूब्या पाछे तू ,नौकरी टोहवेगा बेटा
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प्यार एक तरफा कर बैठ्या,तो होणा स हंगामा
इस्सा पहलवान देई का , तू कोन्या दीखता गामा
इश्क जिसते तू कर रह्य स, वा शादी करके चल ज्यागी
कह्वेंगे साल भर पाछे, उसके बालक तैने मामा
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तू कोए काम धंधा कर -------------------

तेरी जुल्फ और मेरा ख्याल न सुलझेंगे

जद कदे भी तैने मेरी याद सतावेगी
राम कसम तैने नींद ना आवेगी

तेरी जुल्फ और मेरा ख्याल न सुलझेंगे
जितनी करेगी कोशिश उतने ही उलझेंगे
मन की हिरनी जितना ए तेज़ भगावेगी............राम कसम,,,,,,,,,

दर्द जुदाई का कुछ इस तरह मिटाउ सूँ
तेरे हिस्से का टेम एकला बिताउ सूँ
बाट में सूँ तू कदे आंसुआ त नहावेगी .........राम कसम तू .............

किसका था कसूर तैने हाल सारा बेरा था
रौशनी में कौन नहाया किसके घर अँधेरा था
किसके आगे बात तू साच्च्ली बतावेगी .........राम कसम

Thursday, 21 July 2011

एक चुटकला मेरी मैडम का बताया होया सुनो याद आगया

किसे क घर में ब्याह टेक राख्या था,, वहा घणी ए लुगाई आरी थी,, इब एक लुगाई ताऊ कसूते की बहू त बोली ए बेबे यो पीढ़ा दिए दिखा,,,सुनके दूसरी बोली के करेगी ,तो वा लुगाई बोली पीढ़े पे बैठके गीत गाऊँगी,, इब कसूते की बहू बोली ,,,आछ्या तू पीढ़े पर बैठ के गीत गावेगी तो मैं के उरे तेरे खसम न रोवण आरी सूं

शबनम का कत्ल करने वाली भौर ना हो तो अच्छा है

दिल में किसी की यारी का शोर ना हो तो अच्छा है
करम दोस्तों के अब और ना हो तो अच्छा है
ना सजे कही महफ़िलें और ना कही मैं शेर कहू
झूठी वाह-वाह सुनने का दौर ना हो तो अच्छा है
झूठी है तो झूठ रहे होठों की मुस्कान मगर
धडकनों पे किसी का गौर ना हो तो अच्छा है
बेशक रहे ख्वाब अधूरे रात मगर ये रात रहे
शबनम का कत्ल करने वाली भौर ना हो तो अच्छा है
देख लिया परख के बेचैन, गैर-गैर ही निकले
भविष्य में दिल का कोई चितचोर ना हो तो अच्छा है